१ जितना अभी ठगे हो
उतना सरल नही है जीवन
जितना तुम समझे हो
पाथ उतना ही सेष अभी है
जितना अभी चले हो
युग बदला बदली परिभाषाएं
तुम आब तक बहिन खडे हो
चालबाज दुनिया है साड़ी
तुम भोले सरल बने हो
चलने का संकल्प लिए थे
छो कर आस्मान बे लोटे
समझा समझा हरी दुनिया
तुम आब तक वहीँ खडे हो
कहीं आधिक ही ठगे जाओगे
जितना अभी ठगे हो.
थिस पोएम वास रेसितेद ब्य अन अन्नौंसेर ऑफ़ दूर दर्शन उंदर थे प्रोग्रम्मे एम्.एस.एम्.त. ई.ए. मिले सुर मेरा तुम्हारा ओं ०७/०३/१९९५ , १४/०३/९५ ऎंड ओं २२न्द् मार्च ,९५. थे समे वास अवार्देद विथ आकाश प्रिज़े ऑफ़ रस .५०० /
२. गिनती =कोउन्तिंग
साड़ी उम्र सिर्फ इसी
गिनती मैं बिता दीं
कि यह मेरा है -------यह मेरा है
और किसी
कमजोर शीशे कि तरह
बर्बर जब यह भ्रम टूटा
तो पल भर को ठिठका ठहरा
सोचा आब नही गिनुगा
भ्होल जाऊंगा गिनती
जो है सो ठेक है
क्या करना है
चार दिन कि ज़िन्दगी है
दो तीन बीट गए
एक दो और बीट जायेंगे
पर गिनती कि आदत नही गैशायद जायेगी भी नही.
Monday, September 24, 2007
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1 comment:
बहुत अच्छी कवितायें हैं....आगे इंतज़ार रहेगा!आप मेरे ब्लॉग पर आये...धन्यवाद!
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